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Saturday, 1 August 2020

स्टेट बैंक की कहानी


ज़रूरी नहीं कि
पापों के प्रायश्चित के लिए दान पुण्य ही किया जाए।

स्टेट बैंक में खाता
खुलवा कर भी
 प्रायश्चित किया जा सकता है..

छोटा मोटा पाप हो, तो
 बैलेंस पता करने चले जाएँ।

चार काउन्टर पर धक्के खाने के बाद पता चलता है, कि
 बैलेंस गुप्ता मैडम बताएगी।

गुप्ता मैडम का काउन्टर कौन सा है,
 ये पता करने के लिए
 फिर किसी काउन्टर पर जाना पड़ता है।

लेवल वन कम्प्लीट हुआ। यानी गुप्ता मैडम का
 काउन्टर पता चल गया है। लेकिन थोड़ा वेट करना पड़ेगा, क्योंकि
 मैडम अभी सीट पर नहीं है।

आधे घंटे बाद चश्मा लगाए,
 पल्लू संभालती हुई, 
युनिनोर की 2G स्पीड से चलती हुई गुप्ता मैडम
 सीट पर
विराजमान हो जाती है।
आप मैडम को 
खाता नंबर देकर बैलेंस पूछते है।

मैडम 
पहले तो
आपको इस तरह घूरती है,
जैसे 
आपने उसकी
बेटी का हाथ मांग लिया है। आप भी
 अपना थोबड़ा ऐसे
बना लेते है
जैसे सुनामी में आपका सब कुछ उजड़ गया है,
और आज की तारीख में
 आपसे बड़ा
लाचार दुखी कोई नहीं है।

गुप्ता मैडम को 
आपके
थोबड़े पर तरस आ जाता है, और 
बैलेंस बताने जैसा भारी काम करने का मन बना लेती है। लेकिन
 इतना भारी काम, अकेली अबला कैसे कर सकती है?
 तो मैडम सहायता के लिए आवाज लगाती है~

"मिश्रा जीsss, ये बैलेंस कैसे पता करते है?"

मिश्राजी,
 अबला की
 करुण पुकार सुनकर
अपने
 ज्ञान का
ख़ज़ाना खोल देते है।

पहले तो खाते के अंदर जाकर क्लोजिंग बैलेंस पर क्लिक
 करने पर बैलेंस आ जाता था। लेकिन अभी सिस्टम 
चैंज हो गया है। अभी आप
 f5 दबाएँ, 
और इंटर मार दे, तो 
बैलेंस दिखा देगा.."

गुप्ता मैडम 
चश्मा ठीक करती है,
 तीन बार मॉनिटर की तरफ और तीन बार की-बोर्ड की तरफ़
नजर मारती है। 
फिर उंगलियाँ की-बोर्ड पर 
ऐसे फिराती है, जैसे कोई तीसरी क्लास का लड़का वर्ल्ड मैप में सबसे छोटा देश मस्कट ढूंढ रहा हो.

मैडम फिर मिश्रा जी को 
मदद के लिए पुकारती है~
"मिश्रा जी, 
ये f5 किधर है..??"

शायद मैडम की उम्र पचास से ऊपर होने के कारण.
 मिश्रा जी
 पास आकर मदद करने की ज़हमत नहीं उठाते।
इसलिए
 वहीँ बैठे बैठे
जोर से बोलते है~

की बोर्ड में 
सबसे ऊपर देखिये मैडम.."

"लेकिन सबसे ऊपर तो 
सिर्फ़ तीन बत्तियां जल रही है.."

"हां उन बत्तियों के नीचे है। 
लम्बी लाइन है
 f1 से लेकर f12 तक.."

फ़ायनली,
 मैडम को f5 मिल जाता है। मैडम झट से बटन दबा देती है। मॉनिटर पर आधे घंटे तक 
 रेतघड़ी, (कुछ लोग उसे डमरू कहते हैं)
 बनी रहती है।

अंत में
एक मैसेज आता है~
"Session expired. Please check your connection.."

मैडम अपने हथियार डाल देती है।
एक नजर, आपके
 ग़रीबी-लाचारी से पुते चेहरे पर
डालती है और कहती है~
"सॉरी, सर्वर में प्रोब्लम है.."

कहने का टोन 
ठीक वैसा ही
होता है, जैसे
 पुरानी फिल्मों में डॉक्टर ओपरेशन थियेटर से बाहर आ कर
कहता था~

"सॉरी, हमने बहुत कोशिश की
पर ठाकुर साहब को
नहीं बचा पाए..."

🤪👍
(इस सत्यकथा का परम  आनन्द, केवल भुक्तभोगी ही उठा पाएंगे.)

Tuesday, 23 June 2020

🎯भारत में प्रथम महिलायें🎯

1. प्रथम भारतीय महिला क्रिकेट टीम कप्तान *– शांत रंगा स्वामी (कर्नाटक)*2. भारत की प्रथम महिला शासक *– रजिया सुल्तान (1236)*3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष *– एनी बेसेन्ट (1917)*4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष *– सरोजिनी नायडू*5. प्रथम क्रान्तिकारी महिला *– मैडम कामा*6. देश के किसी राज्य विधायिकी की प्रथम महिला विधायिका *– डॉ. एस. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी (मद्रास विधान परिषद् 1926)*7. भारत के किसी राज्य की विधान सभा की प्रथम महिला अध्यक्ष *– श्रीमती शन्नो देवी*8. देश के किसी राज्य के मंत्रिमण्डल में प्रथम महिला मंत्री *– विजय लक्ष्मी पंडित (संयुक्त प्रांत, 1937)*9. देश के किसी राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री *– सुचेता कृपलानी (उत्तर प्रदेश, 1963)*10. देश के किसी राज्य की प्रथम महिला राज्यपाल *– सरोजिनी नायडू (उत्तर प्रदेश)*11. देश के किसी राज्य की प्रथम दलित मुख्यमंत्री *– मायावती (उत्तर प्रदेश)*12. भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री *– इंदिरा गांधी (1966)*13. केन्द्रीय व्यवस्थापिका का प्रथम महिला सांसद *– राधाबाई सुबारायन (1938)*14. राज्य सभा की प्रथम महिला उपसभापति *– बायलेट अल्बा (1962)*15. राज्य सभा की प्रथम महिला सचिव *– बी. एस. रमा देवी (1993)

Thursday, 16 April 2020

*दो बिस्कुट और एक शिक्षक*


सुन गाँव के ऊंचे अधिकारी,
तूने काम किया विस्मयकारी।
शिक्षक ने दो बिस्कुट खाये,
तूने उसकी रपट लिखा डारी।।

उसका पेट नही था बड़ा,
दो बिस्कुट भी ना समाये।
पर सीमेंट,पत्थर बजरी,
बताओ आपने कैसे पचाये।।

ऐसी अदभुत पाचन शक्ति,
 कैसे तुमने पाई।
सड़के,चारदिवारी,नाली
कैसे तुमको भायी।।

सुना है लेवल-5 के हो,
खुद को अधिकारी कहते हो।
कार के अन्दर बैठे हो,
ए सी बंगलों में रहते हो।

दाढ़ी में एक तिनका है या,
तिनकों में एक दाढ़ी है।
दाल में थोड़ा काला है,
या दाल ही पूरी काली है।।

हमको तो ये सब पता नही,
ये पेपर वाले ही बताते हैं ।
अरबों पर जुबान नही खुलती,
दो बिस्कुट पर पेज भर जाते है।।

मजा बहुत आता है तुमको,
शिक्षक की खिल्ली उड़ाने में ।
दिल दुखता था उस शिक्षक का भी,
कभी मुर्गा तुम्हें बनाने में।।

कमी हमारी थी शायद,
जी भरके तुम्हें पढ़ाया था।
शायद तुम अनुपस्थित थे उस दिन,
जब शिष्टाचार सिखाया था।।

Wednesday, 8 April 2020

मै फंस ग्यो उबा खाणा मे

😃😃😃😃😃😃😃😃

राजस्थान के एक गांव के पुराने कवि एक आधुनिक शादी
के जीमण में खडे खाने (उबो खाने) में फंसे गये, उनकी व्यथा
एक राजस्थानी कविता में-----

"मै रपट लिखास्यु थाणा मे,
मै फंस ग्यो उबा खाणा मे,

मने बात समज मी नी आवे,
गाजर, टमाटर, गोभी काचा खावे,
हाथ मे प्लेट लेने लैण लगावे,
काऊन्टर सु काऊन्टर पर जावे,
ज्यु मगतो फिरे दाणा ने,
मै फंस ग्यो उबा खाणा मे।

बाजोट पोतीया जिमण थाल,
ईण सगलो रो पड ग्यो काल,
ऊबा-ऊबा ही खाई रिया माल,
देश री गधेडी, पुरब री चाल,
पेला जेडो मिठास कटे भाणा मे,
मै फस ग्यो उबा खाणा मे!!

एक हाथ मे प्लेट लिरावो,
साग, मिठाई भेला ही खावौ,
भीड मे लोगो रा धक्का खावो,
घुमता-फिरता भोजन पावो,
ज्यु बलद फिरे घाणा मे,
मै फस ग्यो उबा खाणा मे!

सगला व्यंजन लावना दोरा,
ले भी आवो तो संभालना दोरा,
भीड-भाड ती बचावणा दोरा,
ढुल जावेला रुखालना दोरा,
मै डाफाचुक हो गयो जोधाणा मे,
मै फंस ग्यो उबा खाणा मे!!

आर्केस्टा वाला नाचे गावे,
बिन्द-बिन्दणी हँसता जावे,
घर वाला लिफ़ाफ़ा लिरावे,
सगलो रो ध्यान है गाणा मे,
मै फस ग्यो ऊबा खाणा मे!!

बुढा-बढेरा किकर खावे,
विकलांगो ने कुण जिमावे,
टाबर-टिबर भुखा ही जावे,
कोई बेठा ने कोई ऊबा ही खावे,
ईण लोगो ने कुण समजावे,
देखा-देखी होड लगावे,
सब लागा है आणा-जाणा मे,
मै फस ग्यो उबा खाणा में...!!!!
             
😀😀😀😀😀😀😀😀

Sunday, 29 March 2020

इक्कीस दिन इक्कीस दोहे (कॉरोना स्पैशल)



पर घर पग ना मैलणो, 
                   कित्ती करें मनवार ।
अरज करे है आपने,
                   भारत री सरकार ।।1
कोरोना ने रोकणो, 
                  पहले रूकजो आप ।
नी रूक्या जै आज तो,
                  पछै रहत पछताप ।।2
दवा नहीं इण रोग री,
                   बचिया ही उपचार ।
हैं रती भर मिनखपणो,
                  मत आजो थे बा'र ।।3
हाथ मिलाणो छोड ने,
                      दूर सूं नमस्कार ।
मास्क लगा ने बोलजो,
                    ओ ही है उपचार ।।4
साबु सूं हाथ धोवजो,
                 दिन में दस-दस बार ।
तो ही रुकसी देस में, 
                    कोरोना परसार ।।5
कोरोना रे कोप सूं,
                    मचियो हाहाकार ।
मिनख हुवो तो मानजो,
                  मत आजो थै बा'र ।।6
पुलिस खड़ी है सड़क पर,
                   सब री पहरेदार ।
ऐकर मन सूं बोलजो,
              इन की जय जयकार ।।7
अठी उठी नी जावणो,
                घर में कर विसराम ।
मान सला सरकार री,
                  पूरण होसी काम ।।8
ठंडी चीजों सूं भला,
                 करजो थै परहेज ।
पछै भली थै खावजो,
                  थोड़ी करलो जेज ।।9
जै चावो थै देस में, 
               कल खुशियों रो ताज ।
सरकारी आदेश को,
                सगळा मानो आज ।।10
खबर सही अखबार री, 
                जिण रो कर परसार ।
झूठी अफवा इण घड़ी,
                मत मानो नर नार ।।11
भारत रो परधान भी,
                सबनै जोड़े हाथ ।
समय बितावो आपरो,
                 घरवालों रै साथ ।।12
धरती रे भगवान री,
                सेवा आठो याम ।
दूर करे ऐ रोग ने,
                 आप करो विसराम ।।13
भामासा भी जोर रो,
                  कर रहिया उपकार ।
घर में बैठे कीजिए,
               इन का भी सत्कार  ।।14
संकट री इण टेम में, 
                 सब करजो उपकार ।
भूखे पेट गरीब ने, 
                    रोटी री मनवार ।।15
काळाबाजारी कठी,
                    मत करजो रै सेठ ।
मजबूरी रो फायदो,
                 कितोक भरसी पेट ।।16
सीएम ने सलाम है,
                   सजग करिया प्रांत ।
काफी हद तक हो गयो,
                    कोरोना भी शांत ।।17 
मिलनै री वैळा नहीं,
                   मन सूं राखो मेळ ।
घर वासो भगवान रो,
                  मत मानो थै जेळ ।।18
पढ़ो किताबों ज्ञान री,
                   और पढ़ो अखबार ।
 दुनिया भर री खबर सूं,
                   पावो सच्चो सार ।।19
घर बैठा मत भूलजो,
                    करलो वांने याद ।
जिण रै कारण दैस री,
                    सीमाएं आबाद ।।20
इक्कीस दोहे हर दिन,
                   पढ़ता रहजो आप ।
धरमीदास री वीणती,
                घर ने राखो साफ ।।21

Thursday, 8 August 2019

जचे ही कोनी

बाणियो 'व्यापार' बिना,
दुल्हन 'सिणगार' बिना,
बिन्द  'बारात'  बिना,
चौमासो 'बरसात' बिना.....जचे ही कोनी।

बाग 'माळी' बिना,
जीमणो 'थाळी' बिना,
कविता 'छंद' बिना,
पुष्प 'सुगन्ध' बिना.....जचे ही कोनी।

मन्दिर 'शंख' बिना,
मोरियो 'पंख' बिना,
घोड़ो 'चाल' बिना,
गीत 'सुर-ताल' बिना.....जचे ही कोनी।

मर्द 'मूँछ' बिना,
डांगरो 'पूँछ' बिना,
ब्राह्मण 'चोटी' बिना,
पहलवान 'लंगोटी' बिना.....जचे ही कोनी।

रोटी 'भूख' बिना,
खेजड़ी 'रुँख' बिना,
चक्कु 'धार' बिना,
पापड़ 'खार' बिना.....जचे ही कोनी।

घर 'लुगाई' बिना,
सावण 'पुरवाई' बिना,
हिण्डो 'बाग' बिना,
शिवजी 'नाग' बिना.....जचे ही कोनी।

कूवो 'पाणी' बिना,
तेली 'घाणी' बिना,
नारी 'लाज' बिना,
संगीत 'साज' बिना.....जचे ही कोनी।

इत्र 'महक' बिना,
पंछी 'चहक' बिना,
मिनख 'परिवार' बिना,
टाबर 'संस्कार' बिना.....जचे ही कोनी।

Monday, 3 June 2019

राजस्थान का भौगोलिक वर्गीकरण

1. मरूस्थल 2. मैदान 3. पर्वत 4. पठार
राजस्थान का प्राचीनतम भू-भाग या भौतिक प्रदेष दक्षिण का पठारी भाग हैं जो भारत के गांेडवाना लैंण्ड का भाग हैं।
गोंड़वाना लैण्ड विष्व का सबसे प्राचीनतम पठार हैं।
मरूस्थल व भारत का महान मैदान टर्षरी (तृतीय) काल में टेथिस सागर का हिस्सा था, जो पर्यावरण, जलवायु में परिवर्तन के परिणामस्वरूप मरूस्थल मे बदल गया।
यदि हिमालय नहीं होता तो महान मैदान भी नहीं होता।
पश्चिम/थार का मरूस्थल:-                                                    
जो अरावली के पष्चिम में फैला हुआ हैं। राजस्थान का सबसे बड़ा भौगोलिक प्रदेष जो 1,75,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ हैं। जो राजस्थान के कुल भू-भाग का 60% , 61% हैं।
जिसमें राजस्थान की 40% जनसंख्या निवास करती हैं।
मरूस्थल राजस्थान का सर्वाधिक जनसंख्या वाला भौतिक प्रदेष हैं। (राजस्थान के सबसे बड़ा भू-भाग)
सन् 1981 से 2001 तक सर्वाधिक जनसंख्या वृद्धि दर वाले जिले क्रमष:-
बीकानेर (1981-91)  जैसलमेर (1997-2001)
राजस्थान सरकार के अनुसार मरूस्थल में 12 जिले हैं।
योजना आयोग व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार मरूस्थल में 11 जिलें हैं। इसमें हनुमानगढ़ शामिल नहीं हैं।
12 जिलें:-  गंगानगर , बीकानेर , जैसलमेर , बाड़मेर , जालौर , चुरू , झुन्झनु , सीकर (षेखावटी) , जोधपुर , पाली , नागौर , हनुमानगढ़।
थार में बालूका स्तूपों का विस्तार 58% तक हैं।
मरूस्थल की विषेषताएँ:-
मरूस्थल का उत्तर में विस्तार पंजाब, हरियाणा से लेकर दक्षिण में कच्छ तक हैंे।
पूर्व में अरावली पर्वत, पष्चिम में पाकिस्तान तक फैला हुआ हैं।
बरखान:- भौतिक आकृति हैं, जो मरूस्थल में चलने वाली हवाओं के कारण
निर्मित अर्द्धचंद्राकार स्तूप होता हैं जो स्थानांतरित होते हैं।
ऐसे टीले जोधपुर, सीमावर्ती बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर में सर्वाधिक हैं।
इसको मार्च आॅफ रेगिस्तान भी कहते हैं।
इनका मार्च पूर्व की ओर (अरावली की ओर) हैं।
प्लाया:- ये रेतीले मरूस्थल में हवाओं से निर्मित प्राकृतिक झील होती हैं,जो प्लाया कहलती हैं। (नाड़ी) जैसलमेर।
खड़ीन:- रेगिस्तान में मानव निर्मित झील होती हैं, वर्षां के दिनों में इनमें पानी इकट्ठा होता हैं व किसान इसके चारों और खेती करते हैं, ऐसी कृषि को खड़ीन कृषि कहते हैं।
सेम:- जलप्लावित क्षेत्र होता हैं, ऐसे क्षेत्र का निर्माण अतयधिक सिंचाई के कारण तथा नहर के आसपास होता हैं। सेम क्षेत्र कृषि के लिए अनु-उपयोगी होता हैं। (बाड़मेर-कवास, मलवा)
इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण असंतुलन, मिट्टी का अपरदन की समस्या उत्पन्न हो गई हैंे।
जोहड़:- शेखवटी क्षेत्र में चूना बाहुल्य वाले भागों में कम गहरे तलाबांे का निर्माण होता हैं, जिन्हे स्थानीय भाषा में जोहड़ या जोड़ा कहते हैं।
वेरा:- मारवाड़ क्षेत्र में (जालौर, जोधुपर, पाली) कुएँ को वेरा कहते हैं।
बावड़ी:- ये मानव निर्मित होती हैं जिसमें पानी निकालने के लिए सीढ़ियाँ होती हैं।
बीड़:- शेखावटी, अजमेर, बीकानेर में घास के मैदानों को बीड़ कहते हैं। उदाहरण:- जोड़बीड़, जोहड़बीड़
गोडवाड़:- लूनी नदी व अरावली के मध्य स्थित भू-भाग गोडवाड़ कहलाता हैं।
बांगड़ क्षेत्र:- अरावली के पष्चिम में शेखावटी प्रदेष से लेकर लूनी नदी के बेसिन तक फैला भौतिक प्रदेष। यह नदी और रेत से निर्मित भू-भाग हैं जो कभी कृषि के लिए उपयोगी था।
डोयला/डोई:- लकड़ी के चम्मच को डोलया कहते हैं। शेखावटी क्षेत्र में चाटु कहते हैं। कैर की लकड़ी से बनता हैं।
मरूस्थलीय वनस्पति:-
- मरूस्थलीय वनस्पति को जेरोफाइट कहते हैं।
- ऐसी वनस्पति कठोर छाल वाली होती हैं। जिसकी जड़ें गहरी, पत्तियाँ कांटों के रूप में पाई जाती हैं।
- मरूस्थलीय वनस्पति कठोर होती हैं, क्योंकि मरूस्थलीय जलवायु उष्ण कटिबंधीय हैं।
- ग्लोब पर कर्क व मकर रेखा के बीच का क्षेत्रफल उष्णकटिबंण्धीय होता हैं, जहां सूर्य की किरणें वर्षं के अधिकांष समय तक सीधी पड़ती हैं।
(23)0 कर्क – 23)0 मकर)
खेजड़ी:- उपनाम:-जांटी, शमी, थार का कल्पवृक्ष, थार की तुलसी।
- खेजड़ी की पूजा कृष्ण जनमाष्टमी व दषहरे पर होती हैं।
- दशहरे पर इसकी पूजा राजपूतों द्वारा की जाती हैं।
- इस अवसर पर अस्त्र-ष़स्त्रों की पूजा भी होती हैं।
- खेजड़ी का मेला जोधपुर के पास खेजड़ली गांव में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की नवमी को भरता हैं।
- कृष्ण पक्ष:- शुक्ल (सुदी) पक्ष
- सन् 1730 में खेजड़ी को बचाते हुए 363 स्त्री, पुरूष, बच्चे शहीद हो गए।
- चिपको आंदोलन की विचारधारा यहीं से उत्पन्न हुई।
- वर्तमान में चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा (उत्तरांचल के) हैं।
- सांगरी:- खेजड़ी का फल हैं। ;।चतपस दृ डंलद्ध
- मार्च में बगर यानि फूल लगते हैं, अप्रैल में सांगरी बनती हैं। (लूम)
रोहिड़ा:-
- राजस्थान का राज्य पुष्प हैं।
- रोहिड़े को राजस्थान का सागवान भी कहते हैं।
- राजस्थान के दक्षिण-पष्चिमी भाग (बाड़मेर, जोधपुर, जालौर) में रोहिड़ा सर्वाधिक पाया जाता हैं।
- रोहिडे़ का पुष्प केसरिया हिरमिच (गाढ़ा लाल) होता हैं।
- गर्मी के बढ़ने के साथ रोहिड़ा फलता-फूलता हैं।
- अप्रैल-मई में यह पूर्ण रूप से खिल जाता हैं।
कैर:-
- मरूस्थलीय झाड़ी, जिसके फल का उपयोग सब्जी, आचार बनाने में किया जाता हैं।
- कैर पकने पर ढ़ालू बनता हैं। (लाल रंग का)
कुमटा:-
- जोधपुर, बाड़मेर में कुमटा के पेड़ सर्वांधिक पाए जाते हैं।
- इसके बीज को कुमटिया कहते हैं। जो सब्जी व आचार बनाने में काम आते हैं।
- कुमटा के कांटे टेढ़े होते हैं।
जाल:-
- मरूस्थलीय पेड़ जो पाली, जोधपुर, जालौर क्षेत्र में सर्वांधिक पाए जाते हैंे।
- इसका फल ग्रामीण क्षेत्र में पाया जाता हैं, जिसे पीलू कहते हैं।
- कैक्ट्स, थोर, नागफनी:- ये कांटेदार होते हैं।
गूंदी/गूंदे:-
- पाली, जालौर, जोधपुर, सिरोह में सर्वाधिक पाए जाते हैं। इसका उपयोग आचार बनाने में किया जाता हैं।
- खेजड़ी सर्वाधिक नागौर में पाई जाती हैं।
- कीकर सर्वाधिक शेखावटी क्षेत्र में पाया जाता हैंे।
मरूस्थलीय जलवायु:- मरूस्थल में दो प्रकार की जलवायु पाई जाती हैं:-
उष्ण कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेष:-
इसके अंतर्गत सीमान्त जिले आते हैं। जैसे:- गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, पष्चिमी जोधपुर आदि।
शुष्क जलवायु:- जहां वर्षां की मात्रा औसत 10-15 सेमी. हैं। जहां गर्मी में धूल भरी आंधिया चलती हैं।
उष्ण कटिबंधीय अर्द्धशुष्क जलवायु वाला प्रदेष:-
इसके अंतर्गत अरावली के एकदम पष्चिम में स्थित जिले जैसे:- झुन्झनु, सीकर, चुरू, पाली, नागौर, जलौर, पूर्वी जोधपुर, कुछ हिस्सा सिरोही का अर्द्धषुष्क में आते हैं। जहां वर्षां की मात्रा 40 सेमी. के आसपास होती हैं।
मध्यवर्ती पर्वतीय प्रदेष (अरावली):-
- अरावली राजस्थान के मध्य मे स्थित हैं, जिसका विस्तार उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पष्चिम में 692 कि.मी. तक स्थित हैं।
- उत्तर-पूर्व में इसका विस्तार दिल्ली में रायसीना की पहाड़ियों तक हैं।
- दक्षिण-पष्चिम में गुजरात के पालनपुर जिलें में खेड़ब्रह्यम तक हैं।
- राजस्थान की भौगोलिक सीमाओं के भीतर इसकी कुल लम्बाई 550 कि.मी. हैं।
अरावली का जिलेवार विस्तार:-
उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पष्चिम की ओर क्रमषः-
- अलवर, झुन्झनु (खेतड़ी), जयपुर, सीकर (नीम का थाना), अजमेर, पाली, भीलवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, डुंगरपुर, बांसवाड़ा (14)
- अरावली को मेरू भी कहते हैं।
- अरावली विष्व का प्राचीनतम पर्वत व भौतिक प्रदेष हैं, जिसकी चट्टाने वलयदार हैं।
- खनिजों की मात्रा और संख्या की दृष्टि से धनी हैं। कुछ खनिज ऐसे हैं, जो सर्वाधिक अरावली में पाये जाते हैं। जैसें:-सीसा-जस्ता, चांदी आदि।
- अरावली के दक्षिण में सर्वांधिक खनिज पाए जाते हैं, जैसे-जैसे अरावली के उत्तर-पूर्व में जाते हैं। खनिजों की संख्या व मात्रा में कमी आती हैं।
- अरावली का दक्षिण-पष्चिम भाग सर्वांधिक चैड़ा हैं।
- अजमेर में इसकी चैड़ाई सबसे कम हैं।
- उदयपुर से अजेर तक श्रंृखलाबद्ध हैं, अजमेर के बाद अरावली कटी-छटी हैं।
- अरावली राजस्थान के लिए जल-विभाजन का काम करती है। (वर्षां जल का)
- अरावली भारत के महान जल विभाजक का अंग हैं।
- अरावली के पष्चिम में लूनी नदी बहती हैं व पूर्व में बनास नदी बहती हैं।
- अजमेर अरावली के न् घाटी (यू) में स्थित हैं। (अजमेर अरावली के मध्य में स्थित जिला)।
- प्लेटनुमा भू-भाग में स्थित नगर उदयपुर हैं।
- दक्षिण-पष्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर अरावली की ऊँचाई में कमी आती हैं।
गुरू षिखर:-
- माऊन्ट आबू में स्थित मध्य भारत की सबसे ऊँची चोटी, जिसकी ऊँचाई 1727 मी. हैं।
- कर्नल जेम्स टाड ने गुरू षिखर को संतो का षिखर कहा।
- कर्नल टाड ने अपने एजेन्ट के कार्यकाल में राजस्थान से प्राप्त अनुभवों को लंदन जाकर ‘एनल्स एण्ड एन्टीक्यूटीज आॅफ राजस्थान’ में संकलित किया
हैं।दूसरा भाग ‘ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इण्डिया’ हैं।
- 1822 तक टाड राजस्थान के सबसे लोकप्रिय पाॅलिटिकल ऐजेन्ट थे। ये पष्चिमी राजपूताना प्रान्त के पाॅलिटिकल एजेन्ट रहे थे।
सेर:-
- सिरोही में स्थित, इसकी ऊँचाई 1597 मीटर हैं।
- यह दूसरी सबसे ऊँची चोटी हैं।
जरंगा:- उदयपुर में स्थित तीसरी चोटी, इसकी लम्बाई 1442 मीटर हैं।
उत्तर-पूर्वी व पूर्वी मैदानी भाग:-
- ये मैदान राजस्थान के उत्तर-पूर्व में अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवांईमाधोपुर, दौसा, जयपुर, चम्बल बेसिन और बनास बेसिन में स्थित हैं।
- यह मैदान भारत के महान मैदान का विस्तार हैं।
- महान मैदान उत्तर भारत में गंगा-यमुना का मैदान कहलाता हैं।
- प्रत्यक्ष रूप से गंगा-जमुना के मैदान में अलवर, भरतपुर स्थित हैं।
- एकल रूप में अलवर स्थित हैं।
- समूह रूप में अलवर, भरतपर व धौलपुर स्थित हैं।
विषेषताएँ:-
- ये मैदान राजस्थान का सर्वाधिक उपजाऊ भाग हैं जो कृषि, उद्योग, खेती, व्यापार-वाणिज्य, यातायात की दृष्टि से विकसित हैं।
- इस मैदान का निर्माण जलोढ़ मिट्टी से हुआ हैं। इस मिट्टी को कांप, दोमट व कच्छारी मिट्टी भी कहते हैं।
- जलोढ़ मिट्टी विष्व की सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी हैं।
- इस मिट्टी में सभी प्रकार की फसलें होती हैं।
- इस प्रदेष का जनसंख्या घनत्व सर्वाधिक हैं, जो लगभग 300 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हैं।
- इस मैदान मे 39% जनसंख्या निवास करती हैं।
- मरूस्थल का जनसंख्या घनत्व 50 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से कम हैं।
- इस मैदान में बहने वाली नदियाँ बनास और चम्बल हैं।
- मैदान की पूर्वी सीमा विंध्यन कगार से बनती हैं व पष्चिमी सीमा अरावली से बनती हैं।
- अरावली क्षेत्र मंे 11% जनसंख्या निवास करती हैं, जबकि 9% पठारी भाग स्थित हैंे।
दक्षिण का पठारी भाग:-
- राजस्थान में दक्षिण और दक्षिणी-पूर्वी भाग भारत के गोड़वाना लेण्ड का हिस्सा हैं, जो विष्व का प्राचीनतम पठारी क्षेत्र हैं।
- इस प्रकार राजस्थान का पठारी भाग राजस्थान का प्राचीनतम भौतिक प्रदेष हैं।
- मध्यप्रदेष के मालवा का पष्चिमी विस्तार हैं।
- ये पूर्ण परिपक्व पठार हैंे।
हाड़ौती का पठार:-
- राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में कोटा, बूंदी, झालावाड़, बांरा को हाड़ौती क्षेत्र कहते हैं, क्योंकि यहां पर हाड़ा वंषी चैहानों का शासन था।
- यह मालवा का पष्चिमी विस्तार हैं।
- काली मिट्टी से निर्मित हैं, मालवा का पठार (मध्यप्रदेष) भी काली मिट्टी से निर्मित हैं।
- इस प्रदेष को सोया प्रदेष कहते हैं।
- काली मिट्टी जलोढ़ के बाद सर्वांधिक उपजाऊ मिट्टी हैं।
- हाड़ौती के पष्चिम में चम्बल नदी बहती हैं।
- इस प्रदेष में पार्वती, कालीसिन्ध, आहु, परवान, निवाज नदियाँ कहती हैं, जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से चम्बल नदी में दांयी ओर से मिलती हैं।
- इस प्रदेष में हरियाली अधिक होने पर भी गर्मी अधिक पड़ती हैं, क्योंकि काली मिट्टी की अधिकत हैं।
- गागरोन का किला हाड़ौति का सर्वाधिक प्रसिद्ध किला हैं, जो एक जलदुर्ग हैं, जो कालीसिंध व आहु के संगम पर स्थित हैं।
- हाड़ौती का सबसे प्राचीन जिला बूंदी हैं।
- हाड़ा वंष की प्राचीनतम राजधानी बूंदी हैं।
- गागरोन के किले में पृथ्वीराज राठौड़ ने वेलि क्रिसन रूकमणसीरी नामक पुस्तक लिखी, जिसे दुरसा आढ़ा ने पांचवा वेद कहा।
मुकन्दवाड़ा का पठार:-
- कोटा, बूंदी, झालावाड़ के मध्य स्थित पठारी भाग, जहां दुर्रा नामक अभ्यारण्य (कोटा) में स्थापित किया जा रहा हैं।
- जिसे तीसरा राष्ट्रीय अभयारण्य का दर्जा देने की प्रक्रिया चल रहीं हैं।
ऊपरमाल की पहाड़ियाँ:-
- राजस्थान के दक्षिण-पूर्व के मध्य भाग में स्थित पठारी भाग जिसका सर्वांधिक विस्तार भीलवाड़ा में हैं।
- ऊपरमाल का क्षेत्र बिजौलिया (भीलवाड़ा) किसान आंदोलन, बेंगू (चित्तौड़गढ़) आंदोलन के लिए प्रसिद्ध था।
भोराट का पठार:- उदयपुर के गोगुन्दा और राजसमन्द के कुम्भलगढ़ के मध्य में स्थित पठार हैं।
मगरा/भाकर/डूंगर:- पहाड़ी क्षेत्र जो पाली की पूर्वी सीमा, राजसमन्द, उदयपुर, सिरोही, अजमेर के दक्षिण में स्थित हैं।
बांगड़ क्षेत्र:- डंूगरपुर, बांसवाड़ा को बांगड़ क्षेत्र कहते हैं। (वाग्वर) (व्याघ्रवाट)
मेवल:- डंूगरपुर व बांसवाड़ा के बीच का क्षेत्र मेवल कहलाता हैं।
भाकर:-
- तीव्र ढ़ाल वाली ऊबड़-खाबड़ कम ऊँची पहाड़ियों को सिरोही, जालौर, पाली में भाकर कहते हैं।
- पाली में मानपुरा कस्बा मानपुरी भाकरी कहलाता हैं।
छप्पन का मैदान:-
चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, डंूगरपुर, बांसवाड़ा व उदयपुर का मध्यवर्ती भाग/मैदानी भाग छप्पन का मैदान कहलाता हैं। यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र हैं।
गिर्वा/गिरवा:-
गिर्वा जहां उदयपुर स्थित हैं, उसके चारों ओर स्थित पहाडियाँ व समतल मैदान से निर्मित भौतिक आकृति गिरवा कहलाती हैं।
खेरवाड़/खेराड़:- भीलवाड़ा में स्थित हैं। यह बनास नदी का बेसिन हैं।
मेरवाड़ा की पहाडियाँ:-
- यहा मेर नामक जाति के लोग रहते थे। इसका विस्तार अजमेर के दक्षिण में, पाली, राजसमंद, भीलवाड़ा के मध्य में हैं।
- ब्रिटिष सरकार ने क्रांति के समय मेर बटालियन का गठन किया था, जिसने नसीराबाद छावनी की सुरक्षा की।
मेवात:- अलवर व भरतपुर को मेवात कहते हैं।
डूंगरपुर-बांसवाड़ा से कर्क रेखा गुरजती हैं, जो डूंगरपुर के दक्षिण किनारे को छूते हुए बांसवाड़ा के लगभग मध्य से होकर गुजरती हैं।